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Showing posts from November, 2017

अनकही कहानी

भले ही एक आंगन में नहीं पले थे पर हमेशा हाथ पकड़ कर चले थे साथ तो बचपन से था कुछ बनना ही था दोनों का सपना जितना करीब घर था उतना करीब दिल भी था अपना । याद होगा तुझे भी कितना साथ रहते थे कुछ भी होता तो बस एक दूसरे से कहते थे इतने साल बाद तुझमें एकदम से इतना बदलाव कैसे आया सच कहूं तो मैं ये बिल्कुल नहीं समझ पाया आज तक तो हमने कुछ नहीं था छुपाया पर देख तूने इतना कुछ किया फिर भी मैन तुझे कुछ नहीं बताया ठीक या खराब  था जब सब कहा नहीं कुछ मैंने न तूने तब फिर क्यों तूने ऐसा किया जहां मुझे जरूरत थी वहीं छोड़ दिया अगर इतना ही जीतना था तुझे कह देता एक बार मुझे खुद को तो हार ही जाता और ये दुनिया भी जीत कर देता तुझे । गम इस बात का नहीं है कि शायद कोई और मिल गया होगा तुझे बस इसीलिए अब मेरी जरूरत नहीं थी तुझे पर हाँ, उम्मीद नहीं थी मुझे किसी ऐसे मोड़ पर तू हारेगा पर सोचा न था कि तू मरेगा और मुझे भी मारेगा । बात ही कुछ ऐसी थी कि मैं कह नहीं सकता और तू समझ नहीं सकता क्योंकि कुछ ऐसा था अपने बीच क्या था तू , कौन था तू ये कभी मैं जान न पाया इतना प्यार किया फिर ...