उलझनें तो सबको होती है फिर मैं ही क्यों घबराता हूँ बस धागे है ये तो रंग बिरंगे खुद को इन्हीं में उलझा पाता हूँ बहुत मजबूत थेे जो ये धागे जिन्हें खुद पर लिपटा पाता हूँ बस बाहर निकलने की ही जिद्द थी इन्हें हर वक़्त तोड़ता जाता हूँ । जितना रोज़ काट कर सोता उतना ही फिर उलझा पाता हूँ नहीं जानता किसने किया सब पर रोज़ इन्हें सुलझाता हूँ । करने को तो ये भी था मुश्किल जितना तोडूं उतना ही बंधता जाता हूँ सोचता हूँ छोड़ दूं तोड़ना इनको मगर अनजाने ही लड़ता जाता हूँ । इंतज़ार अंत का है मुझे भी पर धागों में लिपटा पाता हूँ ये भी तो ज़िद्दी है बहुत इन्हीं में जकड़ा जाता हूँ । एक दिन सुहाना आएगा जब धागे डरते जाएंगे खुश बहुत हो जाऊंगा जब ये खुद को टूटते पाएंगे । अहसास इन्हें भी होगा उस दिन जो दर्द मैं झेलता जाता हूँ एक उसी उम्मीद के सहारे ज़िंदा खुद को रख पाता हूँ । piyush.joshi18@in.com