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Showing posts from October, 2017

टुकड़ा

  तुझे तो शायद याद नहीं होगा  क्योंकि उन दिनों तू बहुत छोटा हुआ करता था  पर जब तू धीरे धीरे बड़ा हो रहा था  ठीक उसी समय तुझसे अलग हुआ एक टुकड़ा हूँ मैं । तेरा खयाल तो मां रख लेती थी क्योंकि तू उनका हिस्सा था पर तूने कभी ध्यान ही नहीं दिया मुझ पर  क्योंकि तुझे तो शायद पता भी न होगा कब तेरे बड़े होते होते मैं टूट गया तुझसे तू बहुत छोटा हुआ करता था न उन दिनों तो इसीलिए शायद तू भूल गया होगा   कि तुझसे ही अलग हुआ तेरा ही एक टुकड़ा हूँ मैं । हालांकि तूने कभी ध्यान नहीं दिया  न मुझ पर न उन खिलौनों पर जो पिताजी ने तुझे तोहफ़े में दिए थे  जानते हुए की भूल जाएगा इस टुकड़े को तुझे भुलाने के यत्न तो मैंने भी बहुत किये थे  मेरा तो जीना तुझसे था सीसीलिये तू मुझे याद था  और मैं तेरा कुछ था नहीं इसीलिए भूल गया तू की तुझसे ही अलग हुआ तेरा ही एक टुकड़ा हूँ मैं तेरे पास तो पिताजी भी तो थे  मेरा तो कोई न था तेरे सिवा पर जैसा तू उनका था  वैसा मैं कभी तेरा न था  तरसा नहीं ना प्यार के लिए तू  शायद इसीलिए भूल गया होगा  कि तुझसे अलग हुए तेरा ही एक टुकड़ा हूँ मैं । खिलौने तो बहुत जोड़े थे तूने उनमें से बहुत से तो खुद तो...

बस ! दिल नहीं मानता !

छोटी सी उम्र से सपने पाले थे बड़े बड़े और हार जाता था मैं यूँ ही कभी कभी खड़े खड़े बिना सोचे समझे दौड़ रहा था इसीलिए जल्दी था हांफता कल क्या होने वाला है ये मैं तो क्या , कोई और भी नहीं था जानता सोचा सब छोड़ कर भाग जाऊं पर क्या करूँ , ये दिल नही मानता । संघर्ष सभी को करना है एक दिन ऐसे ही मरना है क्यों न ज़िन्दगी ऐसी बनाई जाए कि जीने में भी मज़ा आए क्या करना है , कैसे करना है ये फिलहाल तो मैं नहीं जानता और कल क्या होने वाला है ये मैं तो क्या , कोई और भी नहीं था जानता सोचा सब छोड़ कर भाग जाऊं पर क्या करूँ , ये दिल नही मानता । पिताजी भी तो लड़े थे कुछ भी नहीं था घर में फिर भी आगे बढ़े थे उम्र बढ़ रही थी उनकी पर सपने अभी भी बड़े थे क्योंकि उन्हें भरोसा था कि उनके बच्चे उनके लिए खड़े थे पर कल क्या होने वाला है ये मैं तो क्या , कोई और भी नहीं था जानता सोचा सब छोड़ कर भाग जाऊं पर क्या करूँ , ये दिल नही मानता । माँ भी तो लड़ी थी हर कदम पर पिताजी के साथ खड़ी थी अपने सपनों को दाँव लगाकर सब परिवार के लिए लड़ी थी उम्र में भले ही पिताजी से छोटी थी पर फिर भी उनके बराबर बढ़ी थी ...

नहीं ! नहीं !

हज़ारों ख्वाहिशें थी मेरे भी दिल में पर मैंने कभी बताया नहीं, क्योंकि जब मैं लड़ रहा था मुसीबतों से तब किसी ने हाथ मुझे थमाया नहीं । जरूरत थी मुझे हर रोज़ किसी न किसी की पर किसी ने मुझे कभी अपनाया नहीं, सिसक सिसक कर रो रहा था मैं पर किसी ने मुझे सहलाया नहीं । तमाशा देखने को तो यूँ हज़ारों लोग आ गए थे पर किसी ने मुझे संभाला नहीं भीड़ में खड़े वो भी देख रहे थे मेरी बर्बादी जिनसे मैंने कभी मुँह फिराया नहीं । सोचा था प्यार करेगा मुझे भी कोई पर भीड़ में किसी ने मुझे देखा ही नहीं, क्योंकि कोई और था वहां जो अहसान गिना रहा था पर मैंने तो कभी अहसान जताया ही नहीं । डूब रहा था मैं, और देख रहे थे वो सब पर किसी ने मुझे बचाया नहीं, क्या ही उम्मीद कर रहा था मैं उनसे जिन्होंने कभी मुझे अपना बताया ही नहीं । अपनी खुशियाँ रख दी थी किनारे क्योंकि कभी किसी को रुलाया नहीं, और वो कम्भख्त ऐसे निकले कि वक्त आने पर अपनाया ही नहीं । ___________________________________________ PS : first posted on my facebook account.