हज़ारों ख्वाहिशें थी मेरे भी दिल में
पर मैंने कभी बताया नहीं,
क्योंकि जब मैं लड़ रहा था मुसीबतों से
तब किसी ने हाथ मुझे थमाया नहीं ।
जरूरत थी मुझे हर रोज़ किसी न किसी की
पर किसी ने मुझे कभी अपनाया नहीं,
सिसक सिसक कर रो रहा था मैं
पर किसी ने मुझे सहलाया नहीं ।
तमाशा देखने को तो यूँ हज़ारों लोग आ गए थे
पर किसी ने मुझे संभाला नहीं
भीड़ में खड़े वो भी देख रहे थे मेरी बर्बादी
जिनसे मैंने कभी मुँह फिराया नहीं ।
सोचा था प्यार करेगा मुझे भी कोई
पर भीड़ में किसी ने मुझे देखा ही नहीं,
क्योंकि कोई और था वहां जो अहसान गिना रहा था
पर मैंने तो कभी अहसान जताया ही नहीं ।
डूब रहा था मैं, और देख रहे थे वो सब
पर किसी ने मुझे बचाया नहीं,
क्या ही उम्मीद कर रहा था मैं उनसे
जिन्होंने कभी मुझे अपना बताया ही नहीं ।
अपनी खुशियाँ रख दी थी किनारे
क्योंकि कभी किसी को रुलाया नहीं,
और वो कम्भख्त ऐसे निकले
कि वक्त आने पर अपनाया ही नहीं ।
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